मैं क्यों लिखती हूँ...?

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः ।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम्
विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः ॥

विद्या इन्सान का विशिष्ट रुप है, गुप्त धन है । वह भोग देनेवाली,
यशदात्री, और सुखकारक है । विद्या गुरुओं का गुरु है, विदेश में वह
इन्सान की बंधु है । विद्या बडी देवता है; राजाओं में विद्या की पूजा
होती है, धन की नहीं  । इसलिए विद्याविहीन पशु ही  है ।

ये सब बेकार की बातें हैं...

शास्त्रों में लिखा है कि सारी विद्याएं  अंतरिक्ष में पहले से विद्यमान हैं, उन्हें  निष्कर्षित करना पड़ता है..
इस हिसाब से जो कुछ किताबों में लिखा होता है उसमे कुछ भी अनोखा नहीं...
वो तो पहले से ज्ञात ही है ..अगर देखा जाये तो उसे पढ़ कर विद्या रूप में
ग्रहण करने वाला  ही वास्तविक महान है...वर्ना सोचने वाली बात है कि जो
ज्ञान सर्वत्र विद्यमान है वो सब के पास  क्यों न होता..
मुझे भी लिखने की  अपेक्षा पढ़ना ही ज़्यादा पसंद था...याद नहीं कि मैं ने
लिखना कब से शुरू कर दिया  ..
वो लिखना नहीं, जिसमे  सभी स्कूल जाते हैं और मजबूरन कुछ न कुछ लिखने को
बाध्य किये जाते हैं..उस तरह का लिखना तो मुझे कभी पसंद आया ही नहीं. हम
जिस ज़माने में स्कूल जाते थे , तब विद्यारम्भ स्लेट और खड़िया की बत्ती से
होता था. अब तो शायद ये चीज़ें बाजार में मिलती ही नहीं. मुझे याद है, हाँ
ये भी आश्चर्य की बात है की मुझे उस उम्र की बातें याद हैं जब मेरे हिसाब
से शायद मैं तीन वीन साल की रही हूँगी..याद है की मैं  किसी और को कॉपी
और पेंसिल से लिखते देख कितना सम्मोहित सी हो जाती थी.. लगता था की कब
मेरे भी दिन आएंगे जब मुझे ये दुर्लभ कीमती चीज़ें हाथ लगाने को
मिलेंगी...पेन की तो बात ही न कीजिये..पिताजी की जेब में लगा हुआ , या
मेज पर रखा हुआ पेन छूने को तरसते मेरे हाथ आगे  बढ़ें ,इससे  पहले ऑंखें
चारो तरफ देख के निश्चिन्त  हो लेती  थीं की कोई देखता न हो... .वैसे
खड़िया से स्लेट पर लिखने का भी मज़ा  कुछ और होता था..हिंदी की मात्राएँ
और पहाड़े सीखने के बाद  , आड़े बेड़े मुंह वाले चेहरे बनाने और फिर धो पोंछ
कर स्लेट को फिर से नया कर देने में जो हार्दिक आनंद आता था वो शायद
ग्रेजुएशन की डिग्री लेने में भी न आये..
लेकिन फिर भी मुझे लिखने से ज़्यादा पढ़ने में मज़ा आता था..इतना मज़ा इतना
मज़ा कि मुझे अपने विद्यारम्भ की पहली किताब का कलेवर, उसके एक एक पेज पर
बने हुए चित्र, लिखावट, यहाँ तक की छपाई की त्रुटि भी याद है..
संयोग से हमारे घर में किताबों का पूरा खज़ाना हुआ करता था..समाचार पत्र,
पत्रिकाएं, पुस्तकें,कविता संग्रह , जीवनियां, लाइब्रेरी  एडिशन की मोटी
मोटी सुव्यवस्थित किताबें भी और आगे पीछे के दो चार   पन्ने फटी हुई आधी
अधूरी किताबें भी.... मैं बिलकुल दीमक की तरह किताबों को चाटा करती
थी...उसी लगन में कब अच्छी   तरह पढ़ना सीख गयी पता ही नहीं चला..नए क्लास
में पहुँचते ही सारी नयी किताबें  15 - 20 दिन के अंदर अंदर पढ़ डालती
थी..फिर बेवकूफी की हद ये कि टीचर क्लास में कुछ पढ़ाएं तो मैं उनके मुंह
के वाक्य लपक  कर आगे आगे बोला करती थी..शिकायत प्रिंसिपल तक जाती..मेरी
पेशी होती ..टीचर के सामने मुझे डांट पड़ती ..वो भी खुश मैं भी खुश...हाँ
मैं भी खुश, क्योंकि उसके बाद उन टीचर को मुझसे बचाने के लिए प्रिंसिपल
महोदया ने मुझे एक क्लास आगे कर दिया...(हमारे स्कूल में इसे क्लास डाकना
कहते थे )....
इस बात का उस बात से कतई सम्बन्ध नहीं है कि प्रिंसिपल महोदया मेरी खुद
की माँ थीं....
शायद इसीलिए,  आगे चल कर जब मैं  हाई स्कूल करने के लिए आर्य कन्या
विद्यालय में पहुंची , तो मेरी उम्र इतनी कम थी कि वहां हर शनिवार को
अनिवार्य रूप से होने वाले हवन में कुछ लड़कियां और शिक्षिकाएं पूजा स्थल
से दूर क्यों बैठी रहती थीं, ये मेरी बिलकुल समझ में नहीं आता था..

खैर...पढ़ने का ये शौक तब तक अनवरत चलता रहा जब तक चालीस की उम्र में
आँखों पर चश्मा नहीं चढ़ गया..मैं कुछ अजीब सी पढ़ंतू जीव थीं...अलमारी में
अख़बार बिछाना हो तो पुराना अख़बार पढ़ना चालू कर देती थीं..ट्रेन में कहीं
जा रही हूँ तो अगले की  मैगज़ीन ऊपर वाली बर्थ से झांक कर पढ़ डालती
थीं..बाजार से कागज़ के चोंगे में कोई चीज़ आई तो मैं चोंगा करीने से खोल
कर पढ़ लेती थी.......खिड़की के पत्थर पे, सावन के झूले पे, आम की डाल पे ,
घर की बॉउंड्री वाल पे, यानी कि  हर जगह मेरे हाथ में कोई नंदन,
चन्दामामा, पराग, दीवाना तेज, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका ,
कादम्बिनी, सुषमा, माधुरी.......कुछ भी सही  ......मानसिक भोजन अवश्य
रहता था....
फिर भी , मुझे लिखने में कभी आनंद नहीं आता था....इम्तिहान में भी , कम
से कम शब्दों में जल्दी से पेपर पूरा किया और बाहर...दरअसल इम्तिहान देने
वाली पढाई तो मैं ने कभी की ही नहीं..मेरी किस्मत का सितारा ज़रूर उन
दिनों काफी बुलंद रहा होगा जो मैं कभी फेल नहीं हुई वर्ना बारहवीं क्लास
तक, अपनी याददाश्त में मैं  कभी खुद को पढाई करते हुए नहीं पाती
हूँ....दसवीं की बोर्ड परीक्षा में तो ये हाल था कि मेरे स्वर्गीय बड़े
भाई साहब मुझे गणित   के सवाल दे कर एक कमरे में बंद कर देते थे और मैं
खिड़की के ऊपर बने हुए रोशनदान से बाहर  निकल कर बालू में घर बना कर पैर
डाले हुए बैठी मिलती थी...इस किस्म की  घटनाओं के बाद से फिर उन्होंने
मुझसे संतोष कर लिया और  पंगा लेना छोड़ दिया .....

आज दुर्भाग्य से भाई साहब का संरक्षात्मक हाथ मेरे सर पर नहीं रहा
...सिर्फ यादें ही रह गयी हैं...तब समझ में नहीं आता था कि उनके कड़े
अनुशासन में मेरे भविष्य की चिंता छुपी होती थी ....तब मैं उनके द्वारा
पकडे जाने से बहुत डरती थी  ..फिर भी न जाने कैसे ,पढ़ने वाला कीड़ा जब
मुझे काटता था तो मैं उनकी अत्यंत गोपनीय स्थलों पर छुपाई हुई किताबें भी
पढ़ डालती थी....(आज उन मूल्यवान   किताबों पर फ़िल्में भी बन रही हैं और
प्रचार में कहा जाता है की मुझे नहीं जानते हो तो अपने पापा, चाचा, ताऊ
से पूछो....मेरा जी चाहता है  कहूँ कि "अरे भाई, मम्मी, मौसी और बुआ,
चाची  से भी पूछ सकते हो..  भी वो तुम्हे ज़रूर  जानती होंगी .... " )

आज मैं ईश्वर को लाख लाख धन्यवाद देती हूँ की इस भयंकर लापरवाही की पढाई
में भी, भले ही यू पी बोर्ड की परीक्षा में मेरे कभी 58 % से ज़्यादा नंबर
नहीं आ सके लेकिन फेल होने का कलंक कभी नहीं लगा....

खैर बात ये थी कि मैं लिखने कैसे लगी....
असल में लिखने के कई कारण होते हैं....
सबसे पहला तो ये कि कोई अगर लिखेगा तभी तो कोई पढ़ेगा....कहावत है कि
"लिखने के लिए पढ़िए और पढ़ने के लिए लिखिए "..यानि कि ये एक चक्रीय क्रम
है ....इधर से लीजिये और उधर पहुँचाइये...
दूसरा कारण ये होता है कि आपको कोई नयी बात पता लगी (ताज़ी ताज़ी अंतरिक्ष
से आई हुई ) तो उसे लिख डालिये ताकि और लोग भी जान सकें..
और तीसरा कारण होता है कायरता....
इस श्रेणी में अधिकतर लेखक , शायर और कवि आते हैं.....अपने मन की बात जब
भरी सभा में , सब के सामने कहने   की हिम्मत नहीं जुटा पाते तो पन्ने
रंगते  हैं...गाढ़े गाढ़े आंसू जब  शब्द बन कर गिरते हैं तो एड्रेनैलिन का
लेवल घटता है  और तबियत हलकी हो जाती है..
इसी श्रेणी में कुंवारे लड़के लड़कियां भी आते हैं...घर से बाहर निकलते हैं
तो आँखों का मन से भगवान जाने क्या कनेक्शन होता है , सुन्दर चेहरे देख
कर अपना मंतव्य भूल जाते हैं....कोई भी विषय ले कर पढाई कर रहे हों लेकिन
बिहारी को नायिका के  नख शिख वर्णन में ,जायसी को श्रृंगार वर्णन में और
उसके बाद मीरा को विरह वर्णन में पीछे छोड़ देते हैं...
ये बच्चे रात को चोरी चोरी डायरी लिखते हैं ,उसे अपने अवांछित/अवांछनीय
कर्मों की तरह छुपाते हैं और फिर शादी तय हो जाने के बाद फाड़ कर जला देते हैं.....
मैं क्यों लिखती हूँ ये बात तो वहीँ की वहीँ  रह गयी...
अब मैं कोई नौकरी वौकरी तो करती नहीं हूँ..खाली बेरोज़गार , दूसरों की
कमाई खाने वाली गृहणी ही हूँ बस...मुझे दिन भर क्या काम..घर के सदस्यों
की ज़रूरत के हिसाब से उनको दिन के चौबीसों घंटे भर ,आराम असायिश के सामान , खाना नाश्ता, कपडे आदि उपलब्ध करने के सिवा मुझे करना ही क्या होता ..मेरा पढ़ना लिखना साढ़े बाइस है (वैसे इस कहावत का वास्तविक अर्थ मेरी समझ में नहीं आता..)
मैं  इधर का माल (विद्या ) उधर एडजस्ट क्यों करूँ... इतनी ज्ञानी भी नहीं
की अंतरिक्ष से विद्या निष्कर्षित करूँ...और कायर तो मुझे भी नहीं लगता
कि मैं हूँ...या क्या पता हूँ ही...
जो भी हो मुझे लिखना नहीं चाहिए क्योंकि अब मेरी उम्र हो चली है और फिर
सौ की सीधी एक बात कि नेट पर लिखने के पैसे तो  मिलते नहीं.. आजकल मैगज़ीन
वाले  भी आर्टिकिल छाप कर पैसे नहीं देते हैं..खामखा टाइम, स्वास्थ्य,
नेट के पैसे ख़राब करिये...घर में खिच खिच का बोनस अलग से ...सो मुझे सारे
काम निपटाने के बाद   खा पी कर सोना चाहिए , बहुत हुआ तो मोहल्ले की किटी
पार्टी में शामिल हो लूँ या सास बहू के सीरियल देख कर अपना जीवन सार्थक
करूँ....बेशक ये न सोचूं कि इस सीरियल की कहानी भी तो किसी ने लिखी ही
होगी और  जिसने लिखी उसे पैसे मिले होंगे या नहीं....

मेरे मस्तिष्क को  ऐसा सोचने का कमांड  चारों ओर से मिला करता  है ..
लोग पूछते है क्या मिलता है लिख कर ..??

पैसे के लिए लिखती हो....??

नेम फेम के लिए लिखती हो...??

ज्ञान प्रदर्शित करने के लिए लिखती हो...??

स्पेशल बनने के लिए लिखती हो....??

काम से बचने के लिए लिखती हो....??

भाव खाने के लिए लिखती हो.....???

क्या आता है जो लिखती हो......???

मैं सच बताऊँ , मुझे बिलकुल नहीं पता कि मैं क्यों लिखती हूँ.....




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